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Interactive Hindi अपठित गद्यांश Worksheets for High level

अपठित गद्यांश और प्रश्नोत्तर-लेखन

परीक्षा में कभी-कभी ऐसे गद्यांश दिए जाते हैं जिनका पाठ्यपुस्तकों से कोई संबंध नहीं रहता। फिर भी उस अंश से संबद्ध कई प्रकार के प्रश्‍न रहते हैं। छात्रों को उनका उत्तर देना पड़ता है। इस अभ्यास से बौद्धिक क्षमता और भाषा पर उनकी कैसी पकड़ है, इसका ज्ञान होता है । उदाहरणार्थ कुछ गद्यांश और उनसे संबंधित प्रश्नोत्तर दिए जा रहे हैं।

अपठित गद्यांश 1

विश्वविद्यालय कोई ऐसी वस्तु नहीं हैजो समाज से काटकर अलग की जा सके । समाज दरिद्र है तो विश्वविद्यालय भी दरिद्र होंगे, समाज कदाचारी है, तो विश्वविद्यालय भी कदाचारी होंगे और समाज में अगर लोग आगे बढ़ने के लिए गलत रास्ते अपनाते हैं तो विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र भी सही रास्तों को छोड़कर गलत रास्तों पर अवश्य चलेंगे । विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में भी अशांति फैली है, जो भ्रष्टाचार फैला है, वह सब का सब समाज में फैलकर यहाँ तक पहुँचा है । समाज में जब सही रास्तों काआदर था, ऊँचे मूल्यों की कद्र थी, तब कॉलेजों में भी शिक्षक और छात्र गलत रास्तों पर कदम रखने से घबराते थे । लेकिन अब समाज ने विशेषत: राजनीति ने, ऊँचे मूल्यों की अवहेलना कर दी और अधिकतर लोगों के लिए गलत रास्ते ही सही बन गए तो फिर उसका प्रभाव कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर भी पड़ना अनिवार्य हो गया। छात्रों की अनुशासनहीनता की जाँच करनेवाले लोग परिश्रम तो खूब करते हैं, किंतु असली बात बोलने से घबराते हैं। सोचने की बात यह है कि पहले के छात्र सुसंयत क्यों थे? अब ये उच्छृंखल क्यों हो रहे हैं? किसने किसको खराब किया है? चाँद ने सितारों को बिगाड़ा है या सितारों नेमिलकर चाँद को खराब कर दिया?

प्रश्‍न :

  1. समाज से काटकर किसको अलग नहीं किया जा सकता ?
  2. विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र कब गलत रास्तों पर चलेंगे?
  3. कौन असली बात बोलने से घबराते हैं ?

उत्तर :

  1. विश्वविद्यालय को समाज से काटकर अलग नहीं किया जा सकता ।
  2. जब समाज के लोग गलत रास्ते अपनाएँगे तब विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र भी गलत रास्ते पर चलेंगे ।
  3. छात्रों की अनुशासनहीनता की जाँच करनेवाले असली बात बोलने से घबराते हैं ।

अपठित गद्यांश 2

मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं। उत्सवों काएकमात्र उद्देश्य आनंद-प्राप्ति है। यह तो सभी जानते हैं कि मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आजीवन प्रयत्न करता रहता है। आवश्यकता की पूर्ति होने पर सभी को सुख होता है। पर, उस सुख और उत्सव के आनंद में बड़ा फर्क है। आवश्यकता अभाव सूचित करती है। उससे यह प्रकट होता है कि हममें किस बात की कमी है। मनुष्य-जीवन ही ऐसा है कि वह किसी भी अवस्था में यह अनुभव नहीं कर सकता कि अब उसके लिए कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। एक के बाद दुसरी वस्तु की चिंता उसे सताती ही रहती है। इसलिए किसी एक आवश्यकता की पूर्ति से उसे जो सुख होता है, वह अत्यंत क्षणिक होता है, क्योंकि तुरत ही दूसरी आवश्यकता उपस्थित हो जाती है। उत्सव में हम किसी बात की आवश्यकता का अनुभव नहीं करते । यही नहीं, उस दिन हम अपने काम- काज छोड़कर विशुद्ध आनंद की प्राप्ति करते हैं। यह आनंद जीवन का आनंद है, काम का नहीं।

प्रश्‍न :

  1. मनुष्य किसलिए आजीवन प्रयत्न करता रहता है ?
  2. उत्सवों का एकमात्र उद्देश्य क्या है ?
  3. मनुष्य को एक के बाद दूसरी चिंता क्यों सताती रहती है ?
  4. आवश्यकता-पूर्ति का सुख क्षणिक क्यों होता है ?

उत्तर :

  1. मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आजीवन प्रयत्न करता रहता है।
  2. उत्सवों का एकमात्र उद्देश्य आनंद की प्राप्ति है।
  3. मनुष्य की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती। अतः उसे एक के बाद दूसरी वस्तु की चिंता सताती रहती है।
  4. आवश्यकता-पूर्ति का सुख क्षणिक इसलिए होता है क्योंकि एक के बाद तुरत दूसरी आवश्यकता उपस्थित हो जाती है।

अपठित गद्यांश 3

निम्नलिखित अपठित काव्यांश को ध्यान से पढ़ें और प्रश्नों का उत्तर दें :

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की उत्कट अभिलाषा थी कि सिन्हा लाइब्रेरी के प्रबंध की उपयुक्त व्यवस्था हो जाए । ट्रस्ट पहले से मौजूद था लेकिन आवश्यकता यह थी कि सरकारी उत्तरदायित्व भी स्थिर हो जाए। ऐसा मसविदा तैयार करना कि जिसमें ट्रस्ट का अस्तित्व भी न टूटे और सरकार द्वारा संस्था की देखभाल और पोषण की भी गारंटी मिल जाए, जरा टेढ़ी खीर थी। एक दिन एक चाय-पार्टी के दौरान सिन्हा साहब मेरे (जगदीशचंद्र माथुर) पास चुपके से आकर बैठ गए । सन्‌ 1949 की बात है। मैं नया-नया शिक्षा सचिव हुआ था, लेकिन सिन्हा साहब की मौजूदगी में मेरी क्या हस्ती? इसलिए जब मेरे पास बैठे और जरा विनीत स्वर में उन्होंने सिन्हा लाइबेरी की दास्तान कहनी शुरू की तो मैं सकपका गया । मन में सोचने लगा कि जो सिन्हा साहब मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और गवर्नर तक से आदेश के स्वर में सिन्हा लाइबेरी-जैसी उपयोगी संस्था के बारे में बातचीत कर सकते हैं, वे मुझ-जैसे कल के छोकरे को क्यों सर चढ़ा रहे हैं। उस वक्त तो नहीं, किंतु बाद में गौर करने पर दो बातें स्पष्ट हुई । एक तो यह कि में भले ही समझता रहा हूँ कि मेरी लल्लो-चप्पो हो रही है, किंतु वस्तुत: उनका विनीत स्वर उनके व्यक्तित्व के उस साधारणतया अलक्षित और आर्द्र पहलू की आवाज थी, जो पुस्तकों तथा सिन्हा लाइब्रेरी के प्रति उनकी भावुकता के उमड़ने पर ही मुखरित होती थी।


प्रश्‍न :

  1. सिन्हा साहब लाइब्रेरी केलिए कैसा मसविदा तैयार करना चाहते थे?
  2. माथुर साहब क्यों सकपका गए ?
  3. सिन्हा साहब किनके साथ और किसलिए आदेशात्मक स्वर में बात कर सकते थे ?
  4. माथुर साहब जिसे लल्लो-चप्पो समझते थे वह वास्तव में क्या था?
  5. कब और कौन नए-नए शिक्षा सचिव हुए थे ?

उत्तर :

  1. सिन्हा साहब लाइब्रेरी के लिए ऐसा मसविदा तैयार करना चाहते थे जिसमें ट्रस्ट का अस्तित्व भी न टूटे और सरकार द्वारा संस्था की देखभाल और पोषण की भी गारंटी मिल जाए ।
  2. माथुर साहब इसलिए सकपका गए क्योंकि सिन्हा साहब-जैसा दबंग व्यक्ति उनके पास बैठकर विनीत स्वर में सिन्हा लाइब्रेरी की दास्तान सुनाने लगे।
  3. सिन्हा साहब का व्यक्तित्व ही ऐसा प्रभावशाली था कि वे मुख्यमंत्री, श्शिक्षा मंत्री तथा गवर्नर तक से सिन्हा लाइब्नेरी-जैसी उपयोगी संस्था के बारे में आदेशात्मक स्वर में बात कर सकते थे ।
  4. माथुर साहब जिसे लल्लो-चप्पो समझते थे, वह वास्तव में सिन्हा साहब का विनीत स्वर उनके व्यक्तित्व के साधारणतया अलक्षित और आर्द्र पहलू की आवाज थी।
  5. सन्‌ 1949 में जगदीशचन्द्र माथुर नए-नए शिक्षा सचिव हुए थे।

अपठित गद्यांश 4

निम्नलिखित अपठित काव्यांश को ध्यान से पढ़ें और प्रश्नों का उत्तर दें :

अनब्दुर्ररहीम खानखाना का जन्म 1553 ई. में हुआ था । इनकी मृत्यु सन्‌ 1625 ई. में हुई । येअरबी, फारसी और संस्कृत के विद्वान्‌ थे ही, हिंदी के विख्यात कवि भी थे। ये सम्राट्‌ अकबर के दरबार के नवरत्नों में एक थे । उनमें हिंदी केएक अन्य प्रसिद्ध कवि गंग भी थे। रहीम कवि अकबर के प्रधान सेनापति और मंत्री थे । इन्होंने अनेक युद्धों में भाग लिया था । युद्ध में सफलता-प्राप्त केकारण अकबर ने इन्हें जागीर में बड़े-बड़े सूबे दिए थे। रहीम बड़े परोपकारी और दानी भी थे । इनके हृदय में दूसरे कवि के लिए बड़े सम्मान का भाव रहता था । गंग कवि के एक छप्पय पर रहीम ने उन्हें छत्तीस लाख रुपए दे दिए थे। जब तक रहीम के पास संपत्ति थी, तब तक वह दिल खोलकर दान देते रहे। रहीम की काव्य उक्तियाँ बड़ी मार्मिक हैं क्योंकि वे हृदय से स्वाभाविक रूप से निःसृत हुई हैं।


प्रश्‍न :

  1. प्रहीम का जन्म और मृत्यु कब हुआ था ?
  2. रहीम किन विषयों के विद्वान्‌ तथा किसके प्रसिद्ध कवि थे ?
  3. रहीम बड़े परोपकारी और दानी थे। कैसे ?
  4. किनकी काव्य उक्तियाँ मार्मिक हैं और क्यों ?

उत्तर :

  1. रहीम का जन्म 1553 ई में हुआ तथा मृत्यु 1625 ई० में हुई ।
  2. रहीम अरबी, फारसी और संस्कृत के विद्वान्‌ तथा हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे।
  3. रहीम बड़े परोपकारी और दानी थे । एक छप्पय पर उन्होंने गंग कवि को छत्तीस लाख रुपए दे दिए थे। जब तक उनके पास संपत्ति थी, तब तक वह दिल खोलकर दान देते रहे ।
  4. रहीम की काव्य उक्तियाँ इसलिए मार्मिक हैं क्योंकि वे उक्तियाँ स्वाभाविक रूप से निकली हैं ।

अपठित गद्यांश 5

निम्नलिखित अपठित काव्यांश को ध्यान से पढ़ें और प्रश्नों का उत्तर दें :

साहित्य के विकास में प्रतिभाशाली मनुष्यों की तरह जन-समुदायों और जातियों की विशेष भूमिका होती है। इसे कौन नहीं जानता कि यूरोप के सांस्कृतिक विकास में जो भूमिका प्राचीन यूनानियों की है, वह अन्य किसी जाति की नहीं । जन-समुदाय जब एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश करता है, तब उसकी अस्मिता नष्ट नहीं हो जाती। प्राचीन यूनान अनेक गण-समाजों में बँटा हुआ था। आधुनिक यूनान एक राष्ट्र है। यह आधुनिक यूनान अपनी प्राचीन संस्कृति से अपनी एकात्मकता स्वीकार करता है या नहीं ? 19वीं सदी में शैले और बायरन ने अपनी स्वाधीनता के लिए लड़नेवाले यूनानियों को ऐसी एकात्मकता पहचनवाने में बड़ा परिश्रम किया । भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान इस देश ने इसी तरह अपनी एकात्मकता पहचानी । इतिहास का प्रवाह ही ऐसा है कि विच्छिन्न हैऔर अविच्छिन्न थी। मानव समाज बदलता है और अपनी पुरानी अस्मिता कायम रखता है। जो तत्त्व मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करते हैं, उनमें इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर निर्मित यह अस्मिता का ज्ञान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । बंगाल विभाजित हुआ और है, किंतु जब तक पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के लोगों को अपनी साहित्यिक परंपरा का ज्ञान रहेगा तब तक बंगाली जाति सांस्कृतिक रूप से अविभाजित रहेगी। विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, जो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परंपरा का ज्ञान कहाँ ज्यादा है और कहाँ कम और इस न्यूनतम ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं ।


प्रश्‍न :

  1. यूरोप के सांस्कृतिक विकास में किसकी भूमिका प्रधान रही है ?
  2. प्राचीन यूनान कितने गण-समाजों में बँटा हुआ था ?
  3. यूनान ने अपनी एकात्मकता कब और किस तरह पहचानी ?
  4. कौन-सा तत्त्व मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करता है ?

उत्तर :

  1. यूरोप के सांस्कृतिक विकास में प्राचीन यूनानियों की विशेष भूमिका रही है ।
  2. प्राचीन यूनान अनेक गण-समाजों में बँटा हुआ था।
  3. जब यूनान अनेक गण समाजों में बँटा हुआ था तब उसकी अस्मिता नष्ट होने लगी । अपनी अस्मिता को नष्ट होते देखकर यूनानियों नेअपनी एकात्मकता के स्वरूप को पहचाना ।
  4. इतिहास और सांस्कृतिक परंपरा के आधार पर निर्मित अस्मिता मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करती है ।

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